सेवा संकल्प से विकसित भारत तक

सामाजिक संस्थाएं बनें विकास का पांचवां स्तंभ

17 सितंबर से शुरू होने वाले सेवा अभियानों को आयोजन से आगे ले जाकर जनभागीदारी, सामाजिक संस्थाओं की शक्ति और स्थायी विकास मॉडल से जोड़ने की जरूरत

लेखक : अनुपम पाण्डेय,वरिष्ठ खोजी पत्रकार एवं NGOTimes.in व bhadas4ngo.com के संपादक

 

भारत की विकास यात्रा केवल सरकारी योजनाओं, बजट और नीतियों की यात्रा नहीं है। भारत की वास्तविक शक्ति उसके समाज में है। गांवों में काम करने वाले स्वयंसेवकों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, पर्यावरण, दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक और गरीब एवं वंचित वर्गों के लिए काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं तक—देश के विकास की एक बड़ी ताकत समाज के भीतर मौजूद है।

इसीलिए सेवा को केवल एक दिन के आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है।

17 सितंबर से शुरू होने वाली सेवा गतिविधियां इसी भावना को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने का अवसर देती हैं। इन गतिविधियों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह हो सकता है कि इन्हें केवल औपचारिक कार्यक्रम न मानकर समाज की वास्तविक भागीदारी और स्थानीय विकास के स्थायी मॉडल में बदला जाए।

सेवा का अर्थ केवल आयोजन नहीं

समस्या तब पैदा होती है जब सेवा गतिविधि फोटो, बैनर और कार्यक्रम समाप्त होने के साथ समाप्त हो जाती है। जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक सेवा कार्यक्रम का कोई परिणाम हो।

यदि स्वास्थ्य शिविर लगता है तो कितने लोगों को उपचार मिला और कितने आगे की चिकित्सा सुविधा से जुड़े—यह दर्ज होना चाहिए।

यदि कौशल प्रशिक्षण दिया गया तो कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितनों ने स्वरोजगार शुरू किया और कितनों की आय में वृद्धि हुई—यह भी देखा जाना चाहिए।

यही आयोजन से प्रभाव की यात्रा है।

सेवा कार्यक्रम की सफलता केवल उपस्थित लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उससे हुए वास्तविक सामाजिक परिवर्तन से मापी जानी चाहिए।

एक नागरिक—एक सेवा संकल्प

सेवा संकल्प अभियान को वास्तव में जनआंदोलन बनाना है तो इसका सरल सूत्र हो सकता है—

“एक नागरिक—एक सेवा संकल्प।”

हर नागरिक वर्ष में कम से कम एक ऐसा कार्य करने का संकल्प ले जो किसी दूसरे व्यक्ति, समाज या पर्यावरण के लिए उपयोगी हो।

कोई पौधा लगाए।

कोई रक्तदान करे।

कोई बच्चे को पढ़ाए।

कोई डिजिटल साक्षरता सिखाए।

कोई बुजुर्ग की सहायता करे।

कोई गरीब विद्यार्थी की पढ़ाई में सहयोग करे।

कोई गांव या मोहल्ले में स्वच्छता अभियान चलाए।

जब करोड़ों लोग छोटे-छोटे सेवा संकल्प लेते हैं तो उनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।

सामाजिक संस्थाओं को विकास का पांचवां स्तंभ बनाने की जरूरत

भारत में विकास की चर्चा सामान्यतः सरकार, प्रशासन, उद्योग और नागरिक समाज के संदर्भ में होती है। लेकिन जमीनी स्तर पर NGO एवं व्यापक सामाजिक संस्थागत क्षेत्र भी एक महत्वपूर्ण शक्ति है।

इसे विकास का “पांचवां स्तंभ” बनाने की दिशा में गंभीर विचार होना चाहिए।

सरकार के पास नीति और संसाधन हैं।

प्रशासन के पास क्रियान्वयन की व्यवस्था है।

उद्योग और CSR के पास वित्तीय एवं तकनीकी क्षमता है।

जनता के पास जनशक्ति और भागीदारी है।

सामाजिक संस्थाओं के पास अक्सर जमीनी पहुंच, स्थानीय अनुभव और समुदाय के साथ निरंतर संवाद की क्षमता होती है।

इन सभी शक्तियों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि साझेदार बनाया जाना चाहिए।

यहां एक तकनीकी बात स्पष्ट करना भी जरूरी है—NGO का अर्थ ही Non-Governmental Organization है। इसलिए सरकारी संस्थाओं को NGO कहना उचित नहीं होगा।

बेहतर व्यवस्था यह होगी कि सरकार, प्रशासन, NGO, ट्रस्ट, सोसायटी, Section 8 कंपनियां, CSR संस्थाएं और नागरिक समूह मिलकर सामाजिक विकास का व्यापक तंत्र तैयार करें।

केवल NGO की संख्या नहीं, उसकी विश्वसनीयता महत्वपूर्ण

देश में बड़ी संख्या में सामाजिक संस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही हैं। लेकिन किसी संस्था की शक्ति केवल उसके पंजीकरण या वर्षों की संख्या से तय नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न यह होना चाहिए—

संस्था वास्तव में जमीन पर क्या काम कर रही है?

उसके लाभार्थी कौन हैं?

आर्थिक संसाधनों का उपयोग कैसे हो रहा है?

क्या उसके पास नियमित लेखा-परीक्षण है?

क्या उसकी गतिविधियों का सामाजिक प्रभाव मापा जाता है?

क्या दान और अनुदान का उपयोग पारदर्शी है?

क्या संस्था अपने काम की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करती है?

ईमानदार और प्रभावी सामाजिक संस्थाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए और संदिग्ध गतिविधियों पर नियमानुसार जांच एवं कार्रवाई होनी चाहिए।

किसी एक संस्था के विरुद्ध आरोप के आधार पर पूरे NGO क्षेत्र को कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं है। इसी प्रकार सामाजिक सेवा के नाम पर किसी भी संस्था को पारदर्शिता से मुक्त नहीं किया जा सकता।

सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—ई

ईमानदार को सुविधा, संदिग्ध पर निगरानी और दोषी पर कानून के अनुसार कार्रवाई।

सेवा क्षेत्र में वित्तीय पारदर्शिता जरूरी

सामाजिक विकास की चर्चा में एक महत्वपूर्ण भ्रम अक्सर दिखाई देता है।

सरकार का सामाजिक क्षेत्र का बजट, NGO को दिया गया अनुदान और CSR खर्च—तीनों एक ही चीज नहीं हैं।

सरकारी सामाजिक क्षेत्र का बजट शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा, कृषि और अन्य क्षेत्रों में सरकार द्वारा किए जाने वाले व्यापक व्यय का हिस्सा हो सकता है।

NGO Grant किसी विशेष योजना या मंत्रालय के अंतर्गत पात्र संस्थाओं को दिया जाने वाला अनुदान हो सकता है।

CSR कंपनियों के सामाजिक दायित्व से जुड़ा अलग वित्तीय तंत्र है।

इसलिए भविष्य में भारत सेवा एवं सामाजिक विकास रिपोर्ट जैसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें सरकारी बजट, सरकारी अनुदान, CSR, सामाजिक संस्थाओं के योगदान और वास्तविक सामाजिक परिणामों को अलग-अलग दर्ज किया जाए।

वित्तीय ऑडिट के साथ सोशल इम्पैक्ट ऑडिट

किसी संस्था का वित्तीय ऑडिट यह बता सकता है कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ।

लेकिन यह जरूरी नहीं कि उससे यह भी पता चल जाए कि उस खर्च से समाज को कितना लाभ मिला।

इसलिए सामाजिक संस्थाओं के लिए दो स्तर पर मूल्यांकन की आवश्यकता है—

1. Financial Audit

पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ?

2. Social Impact Audit

उस पैसे और प्रयास से समाज में क्या परिवर्तन आया?

यदि किसी संस्था ने 1,000 युवाओं को प्रशिक्षण दिया तो रिपोर्ट में यह भी होना चाहिए कि उनमें से कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितनों ने स्वरोजगार शुरू किया और कितनों की आय में वृद्धि हुई।

यही वास्तविक सामाजिक प्रभाव है।

“मेरी सेवा—मेरी कहानी” बन सकता है बड़ा अभियान

सेवा संकल्प अभियान में प्रत्येक जिले से वास्तविक लाभार्थियों और स्वयंसेवकों की कहानियां सामने लाई जा सकती हैं।

नाम हो सकता है—

“मेरी सेवा—मेरी कहानी”

एक किसान की कहानी जिसने जल संरक्षण से अपनी खेती बदली।

एक महिला की कहानी जिसने प्रशिक्षण लेकर अपना व्यवसाय शुरू किया।

एक युवा की कहानी जिसने कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार प्राप्त किया।

एक शिक्षक की कहानी जिसने गांव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाया।

एक सामाजिक संस्था की कहानी जिसने दूरदराज क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाई।

ऐसी कहानियां केवल समाचार नहीं होंगी, बल्कि दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा बनेंगी।

“एक जिला—एक सेवा मॉडल”

भारत के प्रत्येक जिले की अपनी अलग समस्या और अपनी अलग क्षमता है।

कहीं पानी की समस्या है।

कहीं रोजगार की।

कहीं कुपोषण की।

कहीं स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या अधिक है।

कहीं बुजुर्गों की समस्या बड़ी है।

कहीं महिला सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रमुख मुद्दा है।

इसलिए पूरे देश के लिए एक ही मॉडल लागू करने के बजाय—

“एक जिला—एक सेवा मॉडल”

की अवधारणा विकसित की जा सकती है।

हर जिले में प्रशासन, स्थानीय निकाय, NGO, सामाजिक संस्थाएं, उद्योग, CSR और नागरिक समूह मिलकर एक प्रमुख सामाजिक समस्या चुनें और वर्षभर उसके समाधान का लक्ष्य निर्धारित करें।

तब सेवा कार्यक्रम वास्तव में विकास कार्यक्रम बन सकता है।

युवाओं को केवल दर्शक नहीं, भागीदार बनाना होगा

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है।

युवा केवल कार्यक्रम में भीड़ का हिस्सा न बनें, बल्कि उन्हें—

Service Volunteer

Development Reporter

Digital Volunteer

Skill Mentor

Environment Volunteer

Social Innovator

 

जैसी भूमिकाओं से जोड़ा जा सकता है।

कॉलेज और विश्वविद्यालयों में सेवा क्लब, सामाजिक इंटर्नशिप, गांव से जुड़ाव, डिजिटल साक्षरता, पर्यावरण अभियान, रक्तदान और कौशल एवं रोजगार मार्गदर्शन जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा सकता है।

युवाओं को यह समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारी नौकरी पाने से नहीं होता; समाज के लिए उपयोगी काम करना भी राष्ट्र निर्माण है।

महिलाओं की भागीदारी के बिना विकसित भारत अधूरा

विकसित भारत की चर्चा में महिला सशक्तिकरण केवल एक अध्याय नहीं, बल्कि विकास का केंद्रीय विषय होना चाहिए।

महिला स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमियों, प्रशिक्षित युवतियों, कारीगरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सफल मॉडलों को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाया जाना चाहिए।

सेवा संकल्प के दौरान प्रत्येक जिले में कम से कम एक ऐसा मॉडल सामने आ सकता है जिसमें महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनी हो और उसने दूसरी महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ा हो।

सेवा और रोजगार को जोड़ना होगा

भारत में सामाजिक क्षेत्र स्वयं भी रोजगार का बड़ा क्षेत्र बन सकता है।

NGO, ट्रस्ट, सोसायटी, Section 8 कंपनियां, CSR परियोजनाएं और सामाजिक उद्यमों में प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता होती है।

इसलिए सेवा अभियान को—

सेवा + कौशल + रोजगार

से जोड़ा जा सकता है।

युवा सामाजिक क्षेत्र में Project Coordinator, Field Worker, Trainer, Counsellor, Data Manager, Communication Executive, Social Researcher और Development Professional जैसी भूमिकाओं में करियर बना सकते हैं।

इस दिशा में National NGO Employment & Career Network जैसी पहल उपयोगी हो सकती है।

विकास पत्रकारिता की भी बड़ी जिम्मेदारी

सेवा कार्यक्रमों की खबर केवल यह नहीं होनी चाहिए कि कार्यक्रम हुआ और कितने लोगों ने भाग लिया।

विकास पत्रकारिता का सवाल इससे आगे होना चाहिए—

“कार्यक्रम से बदला क्या?”

कितने लोगों को लाभ मिला?

क्या समस्या वास्तव में कम हुई?

किस मॉडल को दूसरे जिलों में लागू किया जा सकता है?

कहां कमी रह गई?

लाभार्थियों का अनुभव क्या है?

यही पत्रकारिता को केवल Event Reporting से निकालकर Development Journalism की दिशा में ले जाता है।

मीडिया को सरकार की योजनाओं की आलोचना करने का अधिकार है और उपलब्धियों को सामने रखने की जिम्मेदारी भी। दोनों के बीच संतुलन ही विश्वसनीय पत्रकारिता की पहचान है।

आरोप और तथ्य के बीच अंतर जरूरी

सामाजिक संस्थाओं से जुड़े मामलों में पत्रकारिता करते समय विशेष सावधानी आवश्यक है।

किसी संस्था या व्यक्ति पर आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं।

यदि किसी मामले की जांच किसी एजेंसी द्वारा की जा रही है तो खबर में—

“जांच के दायरे में”

“एजेंसी के अनुसार”

“आरोप है कि”

जैसे तथ्यात्मक शब्दों का प्रयोग होना चाहिए।

अदालत का अंतिम निर्णय आने से पहले किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित करना उचित नहीं है।

पारदर्शिता की मांग पूरे क्षेत्र को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि ईमानदार संस्थाओं की विश्वसनीयता मजबूत करने के लिए होनी चाहिए।

सेवा से VISION @2047 तक

सेवा संकल्प को केवल एक महीने के कार्यक्रम तक सीमित करने के बजाय इसे एक लंबी विकास यात्रा से जोड़ना चाहिए।

इसके लिए एक व्यापक मॉडल हो सकता है—

DOCUMENT → CONNECT → COMMUNICATE → COLLABORATE → EMPOWER

DOCUMENT — दस्तावेज़

देशभर के सेवा और विकास कार्यों का विश्वसनीय दस्तावेजीकरण।

CONNECT — नेटवर्क

NGO, ट्रस्ट, सोसायटी, Section 8 कंपनियां, CSR और सामाजिक संस्थाओं को जोड़ना।

COMMUNICATE — संवाद

समाचार, विकास पत्रकारिता और जनसंवाद के माध्यम से सफल मॉडल सामने लाना।

COLLABORATE — सहयोग

सरकार, प्रशासन, उद्योग, CSR और सामाजिक संस्थाओं के बीच सहयोग बढ़ाना।

EMPOWER — सशक्तिकरण

युवाओं, महिलाओं, स्वयंसेवकों और सामाजिक संस्थाओं को कौशल, रोजगार और संसाधनों से जोड़ना।

यही मॉडल सेवा को आयोजन से आंदोलन और आंदोलन से विकास की दिशा में ले जा सकता है।

सेवा संकल्प के बाद क्या?

यदि 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक सेवा अभियान चलता है तो 18 अक्टूबर के बाद क्या होगा?

यही किसी भी अभियान की सफलता का वास्तविक परीक्षण है।

जरूरत है कि अभियान समाप्त होने के बाद प्रत्येक राज्य और जिले से एक Service Impact Report तैयार हो।

उसमें दर्ज हो—

कितने कार्यक्रम हुए?

कितने स्वयंसेवक जुड़े?

कितने लाभार्थी रहे?

कितने युवाओं को रोजगार मिला?

कितनी महिलाओं को आर्थिक अवसर मिले?

कितने पौधे लगाए और कितने सुरक्षित रहे?

कितने स्वास्थ्य लाभार्थियों को आगे की सेवा मिली?

कितनी सामाजिक संस्थाएं सक्रिय हुईं?

कितना CSR या अन्य संसाधन लगा?

समाज में वास्तविक परिवर्तन कितना आया?

इसके आधार पर हर वर्ष “भारत सेवा रिपोर्ट” प्रकाशित की जा सकती है।

मीडिया और सामाजिक संस्थाओं की साझेदारी

मीडिया को किसी सरकारी या राजनीतिक अभियान का अनधिकृत प्रचार तंत्र बनने के बजाय स्वतंत्र दस्तावेजीकरण और जनसंवाद के मंच के रूप में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

NGOTimes.in, Bhadas4ngo.com और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म देशभर की सेवा गतिविधियों का दस्तावेजीकरण कर सकते हैं।

इसका उद्देश्य किसी एक संगठन का प्रचार नहीं, बल्कि देशभर में हो रहे वास्तविक सामाजिक कार्यों को सामने लाना और अच्छे मॉडलों को एक-दूसरे से जोड़ना होना चाहिए।

इसी क्रम में विकास स्मारिका–2027 | VISION @2047 जैसे दस्तावेज में सेवा संकल्प अभियान से प्राप्त अनुभवों, सफल मॉडलों, सामाजिक संस्थाओं और जनभागीदारी को स्थान दिया जा सकता है।

राजनीति अपनी जगह, सेवा अपनी जगह

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। राजनीतिक दल लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा हैं और उनकी अपनी राजनीतिक गतिविधियां होती हैं।

लेकिन सामाजिक सेवा का क्षेत्र इससे व्यापक है।

गरीब की सहायता का कोई राजनीतिक रंग नहीं होना चाहिए।

रक्तदान का कोई दल नहीं होता।

जल संरक्षण का कोई दल नहीं होता।

बच्चों की शिक्षा का कोई दल नहीं होता।

बुजुर्गों की सेवा का कोई दल नहीं होता।

पर्यावरण संरक्षण का कोई दल नहीं होता।

इसलिए सेवा के क्षेत्र में दल से ऊपर समाज और राजनीति से ऊपर जनहित की भावना मजबूत होनी चाहिए

विकसित भारत का रास्ता समाज से होकर जाता है

विकसित भारत केवल बड़े एक्सप्रेसवे, नई तकनीक, औद्योगिक निवेश और आर्थिक विकास का नाम नहीं है।

विकसित भारत वह होगा जहां—

हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।

हर युवा को अवसर मिले।

महिलाएं सुरक्षित और आर्थिक रूप से सशक्त हों।

किसान टिकाऊ और लाभकारी कृषि कर सके।

गरीब को सम्मान के साथ अवसर मिले।

बुजुर्ग अकेले न पड़ें।

पर्यावरण सुरक्षित रहे।

जल स्रोत बचें।

सामाजिक संस्थाएं पारदर्शी हों।

नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें।

इसके लिए सरकार जरूरी है, लेकिन सरकार अकेले पर्याप्त नहीं है।

समाज को साथ आना होगा।

अब सेवा को संकल्प से व्यवस्था बनाने का समय

17 सितंबर से शुरू होने वाली सेवा गतिविधियां हमें एक बड़ा अवसर देती हैं।

यह अवसर है—

सेवा को जनभागीदारी से जोड़ने का।

NGO और सामाजिक संस्थाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का।

युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का।

महिलाओं को आर्थिक शक्ति देने का।

मीडिया को विकास पत्रकारिता से जोड़ने का।

CSR को वास्तविक सामाजिक प्रभाव से जोड़ने का।

और 2026 के सेवा संकल्प को 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने का।

यदि हर नागरिक एक सेवा संकल्प ले, हर संस्था अपने काम का सामाजिक प्रभाव दर्ज करे, हर जिला अपना सेवा मॉडल विकसित करे और सरकार-प्रशासन-उद्योग-सामाजिक संस्थाएं मिलकर काम करें, तो सेवा किसी कैलेंडर की तारीख नहीं रहेगी।

वह राष्ट्र निर्माण की निरंतर प्रक्रिया बन जाएगी।

भारत का भविष्य केवल संसद, सचिवालय और सरकारी कार्यालयों में तय नहीं होगा।

उसका एक बड़ा हिस्सा गांवों, कस्बों, मोहल्लों, स्कूलों, खेतों, अस्पतालों, सामाजिक संस्थाओं और नागरिकों की भागीदारी से तय होगा।

इसलिए अब समय है कि हम सेवा को केवल “कार्यक्रम” न मानें, बल्कि उसे “राष्ट्रीय विकास मॉडल” बनाएं।

राष्ट्र केवल सरकार से नहीं, समाज से भी बनता है।

सेवा किसी पर उपकार नहीं—राष्ट्र निर्माण में अपनी हिस्सेदारी है।

और यही भावना—

“आज का सेवा संकल्प — 2047 के विकसित भारत की नींव”

Ngo क्लबों की स्थापना कर वास्तविक जनआंदोलन में बदल सकती है।

लेखक परिचय

अनुपम पाण्डेय | वरिष्ठ खोजी पत्रकार, राजनीति एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखक तथा सामाजिक विकास के सक्रिय संवादक हैं। वे NGO क्षेत्र, सामाजिक संस्थाओं, जनभागीदारी, विकास पत्रकारिता और पत्रकारिता प्रशिक्षण से जुड़े विषयों पर निरंतर लेखन एवं संवाद करते हैं।

वे NGOTimes.in ट्रस्ट एवं Bhadas4ngo.com के संपादक के रूप में सामाजिक क्षेत्र से जुड़े मुद्दों, संस्थाओं और जनहित के विषयों को मीडिया के माध्यम से सामने रखने में सक्रिय हैं।

पत्रकारिता में वे तथ्यपरक, स्वतंत्र और जनहित आधारित लेखन को प्राथमिकता देने तथा युवा पत्रकारों में अध्ययन, तथ्य-जांच और पत्रकारिता की गरिमा के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर देते हैं।

उनके लेखन के प्रमुख विषय हैं—NGO एवं सामाजिक संस्थाओं की भूमिका, पारदर्शिता एवं जवाबदेही, सामाजिक विकास, जनभागीदारी, सेवा, वरिष्ठ नागरिकों के मुद्दे, सुशासन तथा विकसित भारत @2047।

 

अनुपम पाण्डेय — वरिष्ठ खोजी पत्रकार एवं NGOTimes.in व bhadas4ngo.com के संपादक, सामाजिक विकास, जनभागीदारी और विकास पत्रकारिता के लेखक।

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